K-Travel: भारत में K-Culture का प्रभाव पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। कोरियन म्यूजिक, ड्रामा, फैशन और लाइफस्टाइल ने युवाओं और खासकर किशोरों को गहराई से प्रभावित किया है। अब इसी प्रभाव का एक नया रूप “K-Travel” ट्रेंड के रूप में सामने आ रहा है, जो धीरे-धीरे बच्चों की मानसिक स्थिति और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञ इसे सिर्फ एक मनोरंजन का चलन नहीं बल्कि एक गंभीर मनोवैज्ञानिक दबाव मान रहे हैं।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कोरियन लाइफस्टाइल की नकल करने, उसी तरह दिखने और वैसा ही जीवन जीने की चाह ने बच्चों के मन में एक अलग तरह की प्रतिस्पर्धा पैदा कर दी है। यह प्रतिस्पर्धा कई बार अस्वस्थ तुलना और हीन भावना का कारण बनती है। गाजियाबाद में हुई एक दर्दनाक घटना ने इस विषय को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया, जहां तीन किशोरियों की आत्महत्या की खबर ने समाज को झकझोर दिया। हालांकि हर घटना के पीछे कई कारण होते हैं, लेकिन डिजिटल ट्रेंड्स का मानसिक दबाव एक अहम कारक बनता जा रहा है।
K-Travel: बढ़ता जा रहा है इस गेम का क्रेज
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि किशोरावस्था पहचान निर्माण का दौर होता है। इस समय यदि बच्चे आभासी दुनिया को वास्तविक जीवन से ज्यादा महत्व देने लगें, तो उनकी सोच, आत्मविश्वास और भावनात्मक स्थिरता पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। K-Travel जैसी सनक बच्चों को यह महसूस कराती है कि उनकी असली जिंदगी कम आकर्षक है, जिससे निराशा और तनाव बढ़ सकता है।
अभिभावकों की भूमिका इस स्थिति में बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों के ऑनलाइन व्यवहार पर नजर रखना, उनसे खुलकर बातचीत करना और उन्हें वास्तविक जीवन की उपलब्धियों का महत्व समझाना जरूरी है। केवल रोक-टोक लगाने के बजाय डिजिटल दुनिया के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर संतुलित चर्चा करना अधिक प्रभावी माना जाता है।
स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों को भी मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम चलाने की जरूरत है ताकि बच्चे आभासी दबावों से निकलकर अपनी असली पहचान को समझ सकें। समाज को यह समझना होगा कि हर ट्रेंड मनोरंजन नहीं होता, कुछ ट्रेंड धीरे-धीरे मनोवैज्ञानिक चुनौती में बदल सकते हैं।
तकनीक और संस्कृति का प्रभाव स्वाभाविक है, लेकिन संतुलन बनाना अनिवार्य है। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि प्रेरणा लेना अच्छी बात है, पर अपनी वास्तविक पहचान खो देना खतरनाक हो सकता है। जागरूकता, संवाद और संतुलित डिजिटल उपयोग ही इस बढ़ती समस्या का सबसे मजबूत समाधान बन सकता है।
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