Raksha Bandhan History: रक्षाबंधन आते ही घर-घर में इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बाजारों में रंग-बिरंगी राखियां सज जाती हैं और बहनें अपने भाइयों के लिए पसंद की राखी खरीदने लगती हैं। भाई की कलाई पर बंधने वाला यह छोटा सा धागा आज प्रेम, विश्वास और साथ निभाने की भावना का प्रतीक माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर रक्षाबंधन के त्योहार की शुरुआत कैसे हुई और राखी बांधने की परंपरा कहां से आई?
आज रक्षाबंधन को मुख्य रूप से भाई-बहन के रिश्ते से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसकी परंपरा का इतिहास इससे कहीं पुराना और व्यापक माना जाता है। प्राचीन धार्मिक परंपराओं में रक्षा सूत्र को सुरक्षा, मंगलकामना और शुभ आशीर्वाद से जोड़ा गया था। समय के साथ यही परंपरा भाई-बहन के स्नेह से जुड़ती चली गई और आज रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति के प्रमुख त्योहारों में शामिल है।
रक्षाबंधन की शुरुआत कैसे हुई थी?
रक्षाबंधन की शुरुआत को किसी एक घटना या एक निश्चित समय से जोड़ना आसान नहीं है। इसके पीछे अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों, लोककथाओं और क्षेत्रीय परंपराओं का उल्लेख मिलता है।
प्राचीन समय में श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा का धार्मिक महत्व था। उस समय इसका उद्देश्य किसी प्रिय व्यक्ति की सुरक्षा और मंगल की कामना करना माना जाता था। यानी शुरुआती दौर में रक्षा सूत्र का अर्थ केवल भाई की कलाई पर बहन द्वारा राखी बांधने तक सीमित नहीं था।
धीरे-धीरे परिवार और समाज में इस परंपरा का स्वरूप बदलता गया और भाई-बहन के रिश्ते के साथ इसका संबंध मजबूत होता गया।
प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है रक्षा सूत्र का उल्लेख (Raksha Bandhan History)
रक्षाबंधन से जुड़ी परंपराओं की चर्चा धार्मिक साहित्य में अलग-अलग रूपों में मिलती है। भविष्य पुराण के उत्तर पर्व में श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर राजा की कलाई पर रक्षा बांधने से संबंधित विधि का उल्लेख किया गया है।
इससे यह समझने में मदद मिलती है कि पुराने समय में रक्षा सूत्र को सुरक्षा और शुभकामना से जोड़कर देखा जाता था। हालांकि, उस समय इसे आज की तरह केवल भाई-बहन के त्योहार के रूप में समझना सही नहीं होगा।
इंद्र और इंद्राणी की कथा से भी जुड़ी है राखी
रक्षा सूत्र की प्राचीन परंपरा से जुड़ी एक प्रसिद्ध धार्मिक कथा देवराज इंद्र और इंद्राणी की है। मान्यता के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच युद्ध के दौरान इंद्र संकट में थे।
कहा जाता है कि इंद्राणी ने मंत्रों से पवित्र किए गए रक्षा सूत्र को इंद्र की कलाई पर बांधा। इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की। इस कथा में राखी भाई-बहन के रिश्ते के बजाय किसी व्यक्ति की रक्षा और उसके कल्याण की कामना का प्रतीक दिखाई देती है।
यह प्रसंग धार्मिक मान्यता पर आधारित है, इसलिए इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं बल्कि परंपरा और कथा के रूप में देखना चाहिए।
कृष्ण और द्रौपदी की कहानी से जुड़ा है भाई-बहन जैसा स्नेह
रक्षाबंधन की सबसे लोकप्रिय कथाओं में भगवान कृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग भी शामिल है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कृष्ण की उंगली में चोट लगने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था।
कहा जाता है कि द्रौपदी के इस स्नेह से कृष्ण प्रभावित हुए और उन्होंने उनकी रक्षा का भाव निभाया। इसी कथा को अक्सर रक्षाबंधन में मौजूद प्रेम, विश्वास और रक्षा की भावना से जोड़कर देखा जाता है।
हालांकि, यह एक धार्मिक कथा है और इसे आधुनिक रक्षाबंधन की ऐतिहासिक शुरुआत का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता।
समय के साथ भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ गया रक्षाबंधन
रक्षाबंधन का मौजूदा स्वरूप लंबे सामाजिक बदलावों के बाद विकसित हुआ। अलग-अलग इलाकों में श्रावण पूर्णिमा से जुड़ी अपनी-अपनी परंपराएं थीं। कहीं धार्मिक अनुष्ठान होते थे तो कहीं रक्षा सूत्र बांधने की रस्म निभाई जाती थी।
समय बीतने के साथ यह पर्व पारिवारिक रिश्तों का हिस्सा बनता गया। खासकर विवाहित बहनों के लिए राखी का त्योहार मायके से जुड़ने और भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करने का खास अवसर बन गया।
बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती और उसके सुखी जीवन की कामना करती, जबकि भाई बहन के साथ खड़े रहने का संकल्प लेता। इसी भाव ने रक्षाबंधन को एक बेहद आत्मीय पारिवारिक त्योहार का रूप दिया।
क्या रानी कर्णावती ने हुमायूं को सच में राखी भेजी थी?
रक्षाबंधन के इतिहास की चर्चा में रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूं की कहानी अक्सर सामने आती है। लोकप्रिय कथा के अनुसार, संकट के समय रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर सहायता मांगी थी।
लेकिन इस घटना को लेकर ऐतिहासिक स्रोतों और इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं। इसलिए इसे पूरी तरह प्रमाणित इतिहास बताना उचित नहीं होगा। इसे एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक आख्यान के रूप में देखना अधिक सही है।

