Jyon Navak Ke Teer : मौत के बाद देह 

Jyon Navak Ke Teer : मृत्यु को इतना बड़ा एक टैबू या वर्जित विषय माना गया है कि हम कभी घर परिवार में इस बारे में खुल कर बात ही नहीं करते। आज इसी विषय पर मंथन।

Jyon Navak Ke Teer : कनाडा मे बसे लेखक तारिक फ़तेह की इच्छा के अनुसार उनके शव का दाह संस्कार (Body After Death) किया गया। हालांकि वह मुस्लिम थे और धार्मिक रिवाजों के मुताबिक उन्हें दफन किया जाना चाहिए था, पर वह पहले से ही अपनी इच्छा जाहिर कर चुके थे, जिसका सम्मान करते हुए उनके शव को हिन्दू रीति के अनुसार अग्नि को समर्पित किया गया।

मौत एक बहुआयामी मुद्दा है। कितने लोग हैं, कितने जीव हैं धरती पर! कहां से आएगी इतनी ज़मीन, इतनी लकड़ियां, कौन से परिंदे आयेंगे शवभोज के लिए! हर मृत व्यक्ति के साथ या तो लकड़ियां जलती हैं, या थोड़ी जमीन कुर्बान होती है। पर्यावरण भी थोडा मरता है, और ज़मीन के अभाव से पहले से ही त्रस्त धरती के वाशिंदे खुद बेघर रहकर अपने हिस्से की ज़मीन मौत (Body After Death) के हवाले करते हैं। पर यही रिवाज़ है, यही संस्कार, यही धर्म।

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Body After Death

आसमान के हवाले करना 

कुछ दिन हुए ‘डिस्कवरी’ चैनल पर एक कार्यक्रम आ रहा था पारसी समुदाय के बारे में। उनके यहां शव को ‘टावर ऑफ़ पीस’ पर रखने का रिवाज है। पारसी मानते हैं कि मृत्यु का इलाका बुरी ताकतों का होता है और किसी की मृत्यु इन ताकतों की अस्थायी जीत का संकेत है। ऐसे में उनका धर्म कहता है कि मृत देह को अकेले (Body After Death) में छोड़ दिया जाना चाहिए जहां गिद्ध और कौवे उसे खा लें। गिद्ध और कौवों को सृष्टि में इसीलिए बनाया गया है। ‘डिस्कवरी’ का यह कार्यक्रम इसी रिवाज़ के बारे में और गिद्धों के गायब होने पर पारसी समुदाय की चिंताओं से सम्बंधित था।

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Body After Death

हाल ही में साइरस मिस्त्री की मौत के बाद कुछ लोगों ने एक बार फिर पारसियों की धार्मिक रीतियों के बारे में फिर से बातें की। 1980 में देश में चार करोड़ गिद्ध थे जो अब घट कर सिर्फ 19000 रह गए हैं| डिस्कवरी चैनल पर दिखाया जा रहा था कि पारसी समुदाय के किसी सदस्य का शव ‘टावर ऑफ़ पीस’ की छत पर खुले में पड़ा था और उसके परिजन सूनी आंखों से आसमान की ओर ताक रहे थे, परिंदों के इंतजार में। तिब्बत में भी शव को परिंदों को खिला देने का रिवााज था पर वहां की प्रथा और विचित्र थी। वहां शव के छोटे छोटे टुकड़े किए जाते हैं और फिर चील, गिद्धों और कौवों को खिलाया जाता है। आकाश को शव सौंप देने की इस प्रथा को ‘स्काइ बेरियल’ भी कहते हैं|

Body After Death, Funeral Ceremony
महात्मा की शव यात्रा

मशहूर इतिहासकार गोपाल कृष्ण गांधी ने महात्मा गांधी की शव यात्रा के बारे में लिखा है कि यह एक विडम्बना ही थी कि गाधी जी के शव को तोप रखने वाले वाहन में रखा गया था। जीवन भर अहिंसा की पूजा करने वाले गांधी जी के शव को एक विध्वंसक शस्त्र ढोने वाले वाहन में रखा गया था! गांधी जी के सचिव प्यारेलाल ने लिखा है कि गांधी जी अपने शव को रसायन में लपेट कर सुरक्षित रखने के विरोधी थे और उन्होंने सख्त हिदायत दी थी कि जहां उनकी मृत्यु (Body After Death) हो, वहीं उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाना चाहिए।

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पर प्यारेलाल के दस्तावेजों में यह उल्लेख भी मिलता है कि उनके दाह संस्कार में “पंद्रह मन चन्दन की लकड़ियां, चार मन घी, दो मन धूप, एक मन नारियल के छिलके और पंद्रह सेर कपूर का उपयोग हुआ”। जो इंसान एक फ़कीर की तरह रहा, और अपना जीवन बस थोड़े से सामान के साथ बिताया, उसके दाह संस्कार में इतना कुछ खर्च किया गया! यदि गांधी इस बारे में पूरी स्पष्टता से निर्देश देते तो शायद यह सब थोड़े संयम के साथ होता, जैसा वे शायद खुद भी चाहते।

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इस मामले में दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति बड़े स्पष्ट थे। न ही वह धार्मिक थे, न हिन्दू रिवाजों को मानते थे, न ही किसी और। कृष्णमूर्ति से उनके निकट सहयोगियों ने स्पष्ट तौर पर पूछा था कि उनके शव के साथ क्या किया जाना चाहिए । उन्होंने बड़े विस्तार से बताया था कि शव को स्नान करवाने के बाद एक साफ़ कपडे में लपेटा जाए, जो महंगा न हो और फिर जितनी जल्दी हो सके, उसका दाह संस्कार कर दिया जाए। शव को कम से कम लोग देखें, कोई कर्मकांड न हो, और उसे बस लकड़ी का एक कुंदा भर समझा जाए। सुकरात से भी उनके मित्रों ने पूछा था उनके शव के साथ क्या किया जाना चाहिए।

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सुकरात (socrates) ने कहा: “पहले मुझे पकड़ तो लेना, और सुनिश्चित कर लेना कि जिसे पकड़ा है वह मैं ही हूँ; फिर जो चाहे कर लेना!” एंड्रू रोबिनसन (andrew robinson) ने सत्यजित रे (satyajit ray) की जीवनी ‘ द इनर ऑय’  में एक दिलचस्प बात लिखी है। कविगुरु रविन्द्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) की मृत्यु के बाद सत्यजित रे टैगोर के घर पहुंच गए थे और वहां नन्दलाल बोस को सफेद फूलों से गुरुदेव के शव को सजाते हुए देखा। यहां तक तो ठीक था, पर जब शवयात्रा शुरू हुई, तो जिसके लिए मुमकिन हुआ उन लोगों ने कविगुरु की दाढ़ी का कम से कम एक बाल नोचने की कोशिश की, अपनी स्मृति के लिए!

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अंतिम क्रिया के नियम

आम तौर पर शव के अंतिम क्रियाकर्म दो तरीके से किए जाते हैं। एक तो जला कर और दूसरा दफ़न करके। जलाने में लकड़ी का उपयोग कुछ लोगों को आपत्तिजनक लगता है। उनका कहना है कि मृत देह (Body After Death) से ज्यादा कीमती है वृक्ष और उसकी लकड़ियां। जितनी लकड़ियां किसी मृत देह को जलाने के काम आती हैं, उतनी से किसी गरीब घर का कई दिनों का ईंधन निकल आएगा। बिजली से चलने वाले शवदाह गृह में अभी भी परंपरागत हिन्दू जाना नहीं चाहते। उनकी भावनाओं को समझा भी जा सकता है।

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फिर प्रश्न उठता है अस्थियों (Body After Death) का और उनके विसर्जन के लिए आस पास किसी नदी की उपस्थिति का। पर्यावरण की फिक्र करने वालों के लिए नदियों का प्रदूषण एक बड़ा प्रश्न है। हिन्दू रीतियों में साधु-सन्यासियों, छोटे बच्चों और विधवाओं के शव को अग्नि के सुपुर्द करने का रिवाज़ नहीं। उन्हें जल समाधि दी जाती है। सही तकनीक न अपनाई जाए तो शव सतह पर आ जाता है और फिर पशु पक्षी शव का बहुत ही बुरा हाल करते हैं।

देहदान का विचार

जमीन के अभाव, तरह तरह के प्रदूषण और शव की दुर्दशा को देखते हुए बेहतर होगा कि सही सोच वाले लोग, भले ही उनकी संख्या काफी कम ही क्यों न हो, जीते जी अपने सगे-सम्बन्धियों को निर्देश दे दें कि उनके शव के साथ क्या किया जाए। मौत के बाद चलने वाला कारोबार धरती का, कीमती संसाधनों का और परिजनों के धन और ऊर्जा का कम से कम नुक्सान करे तो बेहतर होगा। वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए देहदान का विकल्प भी कई लोग अपनाते हैं और यह भी सही समझ आता है।

टैबू है मृत्यु

समस्या यह है कि मृत्यु को इतना बड़ा एक टैबू या वर्जित विषय माना गया है कि हम कभी घर परिवार में इस बारे में खुल कर बात ही नहीं करते। परिणामस्वरूप इस मामले में सदियों से चली आ रही परम्पराएं ही अपना काम करती हैं, और नये सिरे से सोचने की संभावना बहुत कम रह जाती है। इसमें समाज के राजनैतिक और धार्मिक नेताओं की भी बड़ी भूमिका है। वे मरने के बाद भी वी आई पी बने रहना चाहते हैं। हजारों लोगों की मौजूदगी, सैकड़ों गाड़ियां और लाव लश्कर न हो तो जैसे वे मरने को तैयार ही नहीं होंगे!

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