Internet Blackout: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अब एक नया खतरा दुनिया के सामने खड़ा हो गया है—‘इंटरनेट ब्लैकआउट’। ईरान और अमेरिका के बीच जारी टकराव का असर अब समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबल्स पर दिखने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन केबल्स को नुकसान पहुंचता है, तो इसका सीधा असर भारत समेत कई देशों की डिजिटल सेवाओं पर पड़ सकता है।
दरअसल, पूरी दुनिया का लगभग 95% इंटरनेट ट्रैफिक समुद्र के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स के जरिए चलता है। ये केबल्स यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व को जोड़ती हैं। भारत का इंटरनेट नेटवर्क भी इन अंतरराष्ट्रीय केबल्स पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में अगर किसी कारण से ये केबल्स डैमेज होती हैं या इन्हें टारगेट किया जाता है, तो इंटरनेट स्पीड धीमी हो सकती है या पूरी तरह बाधित भी हो सकती है।
इसका सबसे बड़ा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ेगा। ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम जैसे UPI, नेट बैंकिंग और डिजिटल वॉलेट सेवाएं ठप पड़ सकती हैं। इसके अलावा Amazon, Flipkart जैसी ई-कॉमर्स साइट्स भी प्रभावित हो सकती हैं, जिससे खरीदारी और सप्लाई चेन में रुकावट आ सकती है।
सिर्फ इतना ही नहीं, शेयर बाजार, एयरलाइंस सिस्टम, और यहां तक कि सरकारी डिजिटल सेवाएं भी बाधित हो सकती हैं। IT सेक्टर और फ्रीलांसरों के काम पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा, जिससे आर्थिक नुकसान होने की आशंका है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत सरकार और टेलीकॉम कंपनियां इस खतरे को लेकर सतर्क हैं और वैकल्पिक नेटवर्क तैयार करने पर काम कर रही हैं। लेकिन अगर बड़े स्तर पर केबल्स को नुकसान होता है, तो पूरी तरह बचाव करना आसान नहीं होगा।
इस स्थिति ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया डिजिटल रूप से बहुत ज्यादा निर्भर हो चुकी है? और क्या भविष्य में ऐसे ‘डिजिटल युद्ध’ आम हो सकते हैं?
फिलहाल, आम लोगों के लिए जरूरी है कि वे डिजिटल सेवाओं पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय जरूरी कामों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी रखें। क्योंकि अगर इंटरनेट ठप हुआ, तो इसका असर हर घर तक पहुंच सकता है।

