100 दिन चली इजरायल-अमेरिका और ईरान की जंग, तो महंगाई से हिल सकता है आपका घर का बजट! तेल से लेकर ये चीजें होंगी महंगी

Israel Iran War: मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का कारण बन सकता है। अगर इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष लंबा खिंचता है और करीब 100 दिनों तक जारी रहता है, तो इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। खासतौर पर भारत जैसे देशों में जहां ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर भारी निर्भरता है, वहां महंगाई तेजी से बढ़ सकती है।

इस संभावित संकट की सबसे बड़ी वजह ईरान के पास मौजूद रणनीतिक समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल ट्रांजिट रूट्स में से एक माना जाता है। वैश्विक स्तर पर करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। यदि किसी युद्ध की स्थिति में यह रूट बंद हो जाता है या यहां आवाजाही बाधित होती है, तो दुनिया के कई देशों में तेल की सप्लाई पर भारी असर पड़ सकता है।

ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक अगर यह रास्ता बाधित होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से उछल सकती हैं। अनुमान है कि तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकती हैं। फिलहाल कीमतें इससे कम स्तर पर हैं, लेकिन आपूर्ति में थोड़ी सी भी कमी आने पर बाजार में घबराहट फैल जाती है और कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं।

भारत पर इसका असर
इसलिए ज्यादा पड़ सकता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ना तय है। ईंधन महंगा होने का असर सिर्फ गाड़ियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत बढ़ने से लगभग हर चीज की कीमत बढ़ जाती है।

अगर तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाती है, तो इसका असर रसोई गैस, सब्जियों, दूध, अनाज और रोजमर्रा की अन्य वस्तुओं पर भी दिखाई दे सकता है। ट्रक और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से बाजार में सामान महंगा पहुंचता है, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ताओं को उठाना पड़ता है।

इसके अलावा भारत का आयात बिल भी बढ़ जाएगा, जिससे रुपये पर दबाव पड़ सकता है। रुपये के कमजोर होने से विदेशी सामान और भी महंगा हो सकता है। इस स्थिति में सरकार को भी सब्सिडी और टैक्स नीति में बदलाव जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं ताकि महंगाई को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सके।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मध्य पूर्व में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ेगी। शेयर बाजार, व्यापार और निवेश पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

कुल मिलाकर, अगर यह संघर्ष लंबा चला और तेल आपूर्ति प्रभावित हुई, तो इसका असर केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। यह सीधे आम आदमी की जेब तक पहुंचेगा और घर का मासिक बजट बिगाड़ सकता है। इसलिए दुनिया की नजरें फिलहाल मध्य पूर्व की स्थिति पर टिकी हुई हैं।

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