Diwali Gharaunda Tradition: दिवाली का त्योहार सिर्फ दीप जलाने और मां लक्ष्मी की पूजा करने तक सीमित नहीं है। भारत के अलग-अलग राज्यों में इस पर्व से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं। बिहार में भी दीपावली के मौके पर एक अनोखी रस्म निभाई जाती है। यहां घर की बेटियां अपने हाथों से मिट्टी का छोटा-सा घर बनाती हैं, जिसे घरौंदा कहा जाता है। इस घर को कुलहिया-चुकिया से सजाने की परंपरा भी काफी खास है। आखिर इस छोटे से घर के पीछे क्या मान्यता है और दिवाली पर इसे बनाने का क्या महत्व है?
बेटियों के हाथों से तैयार होता है खुशियों का छोटा संसार
बिहार के कई इलाकों में दीपावली से पहले घर की लड़कियां और बेटियां मिलकर घरौंदा तैयार करती हैं। इसके लिए मिट्टी, ईंट, बांस की पतली लकड़ियों और आसपास मिलने वाली दूसरी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। घरौंदे को इस तरह बनाया जाता है कि उसमें छोटे-छोटे कमरे, दरवाजे और आंगन दिखाई दें।
तैयार होने के बाद इसकी दीवारों पर चूना लगाया जाता है और रंगों से सजावट की जाती है। कई जगह घरौंदे को आकर्षक बनाने के लिए फूलों और अन्य सजावटी चीजों का भी इस्तेमाल होता है। इस पूरी प्रक्रिया में घर की बेटियां उत्साह के साथ हिस्सा लेती हैं।
कुलहिया-चुकिया के बिना अधूरी मानी जाती है परंपरा
घरौंदे की सजावट में सबसे खास स्थान कुलहिया और चुकिया का होता है। ये मिट्टी से बने छोटे-छोटे बर्तन होते हैं, जिन्हें खासतौर पर इस अवसर के लिए सजाया जाता है। इनमें खील और बताशे रखे जाते हैं।
लोकमान्यता के मुताबिक, इन बर्तनों को अनाज और मिठास से भरना घर में खुशहाली, सुख-समृद्धि और संपन्नता का प्रतीक माना जाता है। इसके पीछे कामना होती है कि परिवार में कभी खाने-पीने की कमी न हो और घर हमेशा खुशियों से भरा रहे।
भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी से भी जुड़ी है मान्यता (Diwali Gharaunda Tradition)
घरौंदा बनाने की परंपरा को लेकर एक धार्मिक मान्यता भी प्रचलित है। लोकविश्वास के अनुसार, भगवान श्रीराम जब 14 वर्षों का वनवास पूरा करके माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे, तब पूरी नगरी में उत्सव मनाया गया था। लोगों ने अपने घरों को सजाकर उनका स्वागत किया था।
इसी खुशी और समृद्धि की भावना से घरौंदा बनाने की परंपरा को भी जोड़ा जाता है। हालांकि, यह बिहार की लोकपरंपरा से जुड़ी मान्यता है। घरौंदा बनाकर बेटियां अपने परिवार की सुख-शांति और भविष्य की खुशहाली की कामना करती हैं।
दिवाली के अगले दिन भाई को खिलाए जाते हैं खील-बताशे
इस परंपरा का एक और दिलचस्प हिस्सा दिवाली के अगले दिन देखने को मिलता है। घरौंदे में सजाकर रखी गई कुलहिया-चुकिया से खील और बताशे निकाले जाते हैं। इसके बाद बहनें अपने भाइयों को ये मिठाइयां खिलाती हैं। इसे भाई-बहन के आपसी स्नेह और परिवार के मजबूत रिश्तों से जोड़कर देखा जाता है।
बाजार में मिलने लगे हैं तैयार घरौंदे, फिर भी कायम है पुराना आकर्षण
समय के साथ इस परंपरा में भी बदलाव आया है। अब बाजारों में मिट्टी, लकड़ी और दूसरी सामग्रियों से बने तैयार घरौंदे मिलने लगे हैं। लोग अपनी पसंद के मुताबिक इन्हें खरीदकर घर में सजाते हैं। इसके बावजूद बिहार के कई परिवारों में आज भी बेटियां खुद मिट्टी से घरौंदा तैयार करना पसंद करती हैं।
दरअसल, घरौंदा बनाने का यह रिवाज सिर्फ एक धार्मिक गतिविधि नहीं, बल्कि बचपन की यादों, पारिवारिक जुड़ाव और लोकसंस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है। यही वजह है कि बदलते समय में भी बिहार की दिवाली इस परंपरा के बिना कई परिवारों को अधूरी लगती है।
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