Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्र की शुरुआत के साथ ही घरों में कलश स्थापना और देवी पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इसी दौरान कई घरों में पूजा स्थल पर मिट्टी के पात्र में जौ बोने की परंपरा भी निभाई जाती है। नौ दिनों तक इनकी देखभाल की जाती है और उगने वाले हरे अंकुरों को शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में जौ को अन्न, उर्वरता, समृद्धि और नई शुरुआत का प्रतीक माना गया है।
नवरात्र में जौ बोने का धार्मिक महत्व
मान्यता है कि जौ सृष्टि की शुरुआती फसलों में से एक है। इसलिए नवरात्र में देवी आराधना के साथ जौ बोना नए जीवन और प्रकृति के विकास का प्रतीक माना जाता है। जौ का संबंध अन्न से होने के कारण इसे घर में सुख-समृद्धि और अन्न की निरंतरता की कामना से भी जोड़ा जाता है।
नवरात्र में जौ बोने की पूजा विधि (Shardiya Navratri 2026)
1. पूजा स्थान तैयार करें: सबसे पहले पूजा की जगह को साफ करके वहां चौकी या पाट रखें। उसके पास जौ उगाने के लिए मिट्टी का साफ पात्र रखें।
2. मिट्टी डालें: पात्र में साफ और उपजाऊ मिट्टी भरें। मिट्टी बहुत अधिक कड़ी या गीली नहीं होनी चाहिए।
3. जौ के बीज डालें: मिट्टी की सतह पर साफ जौ के दाने समान रूप से फैला दें। इसके बाद ऊपर से मिट्टी की हल्की परत डाल दें, ताकि बीज पूरी तरह ढक जाएं।
4. जल अर्पित करें: जौ बोने के बाद हल्का पानी छिड़कें। इसके बाद कलश स्थापना की विधि पूरी करके मां दुर्गा की पूजा करें।
5. देवी का ध्यान और संकल्प: पूजा के दौरान मां दुर्गा का ध्यान करते हुए परिवार की सुख-शांति, आरोग्य और समृद्धि की कामना करें। जौ को भी देवी के सामने श्रद्धापूर्वक स्थापित करें।
6. रोज करें देखभाल: नवरात्र के नौ दिनों तक जौ में जरूरत के अनुसार थोड़ा-थोड़ा पानी डालें। मिट्टी को नम रखें, लेकिन उसमें पानी जमा न होने दें।
7. दीप और धूप दिखाएं: प्रतिदिन देवी की पूजा के समय दीपक और धूप दिखाने के बाद जौ के पात्र के सामने भी श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया जा सकता है।
जौ के अंकुरों को लेकर क्या मान्यता है?
लोक परंपराओं में जौ के अंकुरों को आने वाले समय के संकेत से जोड़ा जाता है। यदि जौ अच्छी तरह से उगकर हरे और घने दिखाई दें, तो इसे शुभ और समृद्धि का संकेत माना जाता है। वहीं यदि अंकुर कमजोर हों या जल्दी सूख जाएं, तो कुछ मान्यताओं में इसे विपरीत संकेत माना जाता है।
हालांकि यह धार्मिक आस्था और लोकविश्वास का विषय है। जौ का कम या ज्यादा उगना मिट्टी, पानी, तापमान और वातावरण जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। इसलिए अंकुर ठीक से न निकलने पर घबराने की जरूरत नहीं है।
नवरात्र के बाद जौ का क्या करें?
नवरात्र की समाप्ति के बाद जौ के अंकुरों को श्रद्धा के साथ संभालने की परंपरा है। कई परिवार इन्हें घर के सदस्यों को प्रसाद या आशीर्वाद के रूप में देते हैं और कुछ लोग इन्हें पूजा स्थान या तिजोरी में रखते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसके बाद की परंपरा अलग हो सकती है।
जौ बोने की परंपरा देता है खास संदेश
नवरात्र में जौ बोने की परंपरा देवी आराधना के साथ प्रकृति और अन्न के प्रति सम्मान का संदेश भी देती है। मिट्टी में बोए गए बीज का कुछ ही दिनों में हरे पौधे में बदलना जीवन, विकास और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि आज भी नवरात्र की पूजा में जौ बोने की परंपरा कई परिवारों में श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

