Meena Kumari: हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिनका नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं होता। मीना कुमारी का नाम भी ऐसी ही अभिनेत्रियों में लिया जाता है। पर्दे पर उन्होंने दर्द, मोहब्बत और जुदाई जैसे किरदारों को जिस गहराई से निभाया, उसने उन्हें ‘ट्रेजेडी क्वीन’ की पहचान दिलाई। उनकी फिल्मों की चमक आज भी कायम है, लेकिन उनकी अपनी जिंदगी की कहानी काफी दर्दनाक रही। शोहरत की ऊंचाई तक पहुंचने वाली मीना कुमारी ने बचपन से ही जिम्मेदारियों का बोझ उठाया और जिंदगी के आखिरी दौर में भी मुश्किलों से जूझती रहीं।
चार साल की उम्र से शुरू हुआ था फिल्मी सफर
मीना कुमारी का असली नाम महजबीन बानो था। उनका फिल्मी सफर उस उम्र में शुरू हो गया था, जब ज्यादातर बच्चे स्कूल और खेलकूद में अपना समय बिताते हैं। साल 1939 में उन्होंने ‘लेदरफेस’ में बाल कलाकार के रूप में काम किया था। इस फिल्म के लिए उन्हें करीब 25 रुपये मेहनताना मिला था। कम उम्र में काम शुरू करने के कारण उनका बचपन सामान्य तरीके से नहीं गुजर सका।
कमाई के लिए बचपन से ही करना पड़ा काम
मीना कुमारी के लिए फिल्मों में काम करना सिर्फ पहचान हासिल करने का जरिया नहीं था। परिवार की आर्थिक जरूरतों ने भी उन्हें लगातार काम करने के लिए मजबूर किया। छोटी उम्र में ही वह शूटिंग के लिए अलग-अलग स्टूडियो जाती थीं। धीरे-धीरे उनकी पहचान मजबूत होती गई और वह परिवार के लिए आर्थिक सहारा बन गईं।
‘बैजू बावरा’ के बाद बदल गई पूरी तस्वीर
साल 1952 में रिलीज हुई ‘बैजू बावरा’ मीना कुमारी के करियर में अहम मोड़ साबित हुई। फिल्म की सफलता के बाद उनकी गिनती चर्चित अभिनेत्रियों में होने लगी। इसके बाद ‘परिणीता’, ‘आजाद’, ‘शारदा’, ‘मिस मैरी’ और ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। हर किरदार में उनकी भावनात्मक अदाकारी दर्शकों को अपनी ओर खींचती थी।
शोहरत बढ़ती गई, लेकिन निजी जिंदगी उलझती रही
फिल्मों में सफलता मिलने के साथ मीना कुमारी की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई, लेकिन निजी जीवन में परेशानियां कम नहीं हुईं। उनके पारिवारिक रिश्तों में तनाव का जिक्र कई जगह मिलता है। फिल्ममेकर कमाल अमरोही के साथ उनकी शादी भी लंबे समय तक चर्चा से दूर रही। उनकी जिंदगी में ऐसे कई दौर आए, जिन्होंने उनकी छवि को सिर्फ एक सफल अभिनेत्री तक सीमित नहीं रहने दिया।
‘पाकीजा’ बनी यादगार, मगर जिंदगी का सफर दर्द में खत्म हुआ (Meena Kumari)
मीना कुमारी की सबसे यादगार फिल्मों में ‘पाकीजा’ का नाम आज भी लिया जाता है। इस फिल्म में उनके अभिनय और अंदाज ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। जिस दौर में उनके नाम और काम की चर्चा थी, उसी दौर में उनकी सेहत और निजी जिंदगी से जुड़ी परेशानियां भी बढ़ती गईं।
निधन के बाद सामने आई ऐसी बात, जिसने सबको चौंका दिया
31 मार्च 1972 को मीना कुमारी का निधन हो गया। उनके निधन से जुड़ी एक पुरानी जानकारी आज भी उनकी जिंदगी के आखिरी दौर को लेकर चर्चा में रहती है। फिल्ममेकर बिमल रॉय की बेटी रिंकी राय भट्टाचार्य ने 2014 में एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि उस समय परिवार के सामने अस्पताल का बकाया चुकाने की परेशानी थी। उनके मुताबिक, अस्पताल से मीना कुमारी का शव लेने के लिए करीब 3,500 रुपये की जरूरत थी और परिवार के पास उस वक्त यह रकम भी नहीं थी।
मीना कुमारी की कहानी इसलिए भी याद रह जाती है क्योंकि एक तरफ उन्होंने हिंदी सिनेमा में ऐसी पहचान बनाई, जिसे दशकों बाद भी लोग नहीं भूले हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी निजी जिंदगी संघर्षों से भरी रही। पर्दे पर दूसरों की कहानियों में दर्द निभाने वाली यह अभिनेत्री अपनी जिंदगी में भी कई दर्द अपने साथ लेकर चली गईं।
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