Sharda Sinha: शारदा सिन्हा का नाम आते ही बिहार के गांव, छठ घाट और लोकगीतों की याद ताजा हो जाती है। उनकी आवाज में ऐसी मिठास और अपनापन था कि गीत सुनते ही लोगों को अपने घर-परिवार की याद आने लगती थी। हालांकि, इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था। परिवार की जिम्मेदारियों, विरोध और शुरुआती संघर्षों के बीच उन्होंने संगीत को अपना रास्ता बनाया।
1 अक्टूबर को शारदा सिन्हा की जयंती पर उन्हें याद करते हुए उनकी जिंदगी के वे किस्से सामने आते हैं, जिन्होंने उन्हें सिर्फ एक लोकप्रिय गायिका नहीं बल्कि बिहार की लोक संस्कृति की पहचान बना दिया।
अपनी विदाई से शुरू हुआ एक यादगार किस्सा
शारदा सिन्हा की शादी के समय घर का माहौल भावुक था। विदाई से पहले उनके पिता ने उनसे गीत सुनाने को कहा। उन्होंने उस भावुक माहौल में गीत गाया। आगे चलकर उनकी आवाज में गाए विवाह और विदाई के गीत इतने लोकप्रिय हुए कि लाखों परिवारों के खास मौकों का हिस्सा बन गए।
इस कहानी का सबसे भावुक पहलू यही है कि जिस दिन उन्होंने खुद विदाई का गीत गाया था, बाद में उनकी आवाज अनगिनत बेटियों की विदाई से जुड़ गई।
शादी के बाद भी संगीत छोड़ने को तैयार नहीं हुईं
शादी के बाद संगीत की राह में उनके सामने पारिवारिक चुनौतियां भी आईं। बाहर जाकर कार्यक्रम करने को लेकर आपत्ति जताई गई, लेकिन उनके पति ब्रजकिशोर सिन्हा ने उनका साथ दिया। धीरे-धीरे उनकी प्रतिभा और मेहनत ने लोगों का ध्यान खींचना शुरू किया।
यही वह दौर था जब शारदा सिन्हा ने यह साबित किया कि पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच भी अपनी प्रतिभा को आगे बढ़ाया जा सकता है।
महज 19 साल की उम्र में मिला बड़ा मौका (Sharda Sinha)
संगीत की दुनिया में उनका एक महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया, जब करीब 19 साल की उम्र में वह लखनऊ में एक प्रतिभा-परीक्षण के लिए पहुंचीं। वहां प्रसिद्ध गायिका बेगम अख्तर भी मौजूद थीं। शारदा सिन्हा ने मैथिली विवाह गीत प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति से प्रभावित होकर उन्हें नियमित रियाज जारी रखने की सलाह मिली।
इसके बाद उनकी आवाज मैथिली के साथ भोजपुरी, मगही और हिंदी के गीतों तक पहुंची। लोक संगीत के क्षेत्र में उनकी पहचान लगातार मजबूत होती गई।
फिल्म में गाया तो मेहनताना मिला सिर्फ 76 रुपये
लोकगीतों में पहचान बनाने के बाद शारदा सिन्हा की आवाज फिल्मों तक भी पहुंची। सलमान खान और भाग्यश्री की फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ के गीत ‘कहे तोसे सजना’ में उनकी आवाज सुनाई दी। इस गीत के लिए उन्हें 76 रुपये मिलने की बात लंबे समय से उनके संघर्ष की कहानी का हिस्सा रही है।
बाद में ‘हम आपके हैं कौन’ के विदाई गीत और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के गीतों ने भी उनकी आवाज को हिंदी सिनेमा के दर्शकों तक पहुंचाया। हालांकि, उनकी सबसे मजबूत पहचान फिल्मों से नहीं बल्कि लोकगीतों से बनी।
छठ के गीतों ने घर-घर पहुंचाई आवाज
शारदा सिन्हा और छठ गीतों का रिश्ता इतना गहरा हुआ कि दोनों को अलग करके देखना मुश्किल हो गया। ‘केलवा के पात पर’, ‘सुनअ छठी माई’ और ‘पटना के घाट पर’ जैसे गीत छठ के दौरान आज भी लोगों की जुबान पर सुनाई देते हैं।
खास बात यह रही कि उन्होंने खुद छठ का व्रत नहीं रखा था। उनका मानना था कि छठ के लिए गाए गए उनके गीत ही उनकी ओर से इस पर्व के प्रति समर्पण हैं। उनकी आवाज बिहार से निकलकर झारखंड और देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले पूर्वांचली परिवारों तक पहुंच गई।
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