Success Story: चंबल की पहचान लंबे समय तक बीहड़ों, बंदूकों और बागियों की कहानियों से जुड़ी रही है। इसी चंबल से आने वाले देव प्रभाकर सिंह तोमर ने अपनी जिंदगी की कहानी को बिल्कुल अलग दिशा दी। जिस परिवार ने कभी बेहद कठिन परिस्थितियां देखीं, उसी परिवार की अगली पीढ़ी में देव ने पढ़ाई को अपनी ताकत बनाया। पहले IIT में जगह बनाई, फिर विदेश में नौकरी की और आखिरकार सिविल सेवा को अपना लक्ष्य बनाकर UPSC की परीक्षा पास की। हालांकि यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था। कई बार प्रीलिम्स में असफलता मिली, परिवार की नाराजगी झेलनी पड़ी और निजी जिंदगी में भी मुश्किल दौर आया, लेकिन देव ने तैयारी का तरीका बदला और आखिर में 629वीं रैंक हासिल कर IRTS में चयन पाया।
चंबल के मुरैना से शुरू हुई देव की कहानी
देव प्रभाकर सिंह तोमर मध्य प्रदेश के मुरैना जिले से आते हैं। उन्होंने अपनी यात्रा के बारे में बताया है कि उनके दादा बेहद कठिन पारिवारिक और सरकारी परिस्थितियों के बीच चंबल के बागी बन गए थे। उस दौर का असर सिर्फ उन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परिवार को भी आर्थिक और सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
देव के पिता ने इस स्थिति से निकलने का रास्ता शिक्षा में तलाशा। उन्होंने अगली पीढ़ी को पढ़ाने और बेहतर भविष्य देने का संकल्प लिया। यही सोच धीरे-धीरे देव की जिंदगी का भी आधार बनी और उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद पढ़ाई को प्राथमिकता दी।
घर से पढ़ाई की और पहले ही प्रयास में IIT पहुंच गए
शुरुआती पढ़ाई के बाद देव ने CBSE बोर्ड में पढ़ाई की। नए माहौल, भाषा और सांस्कृतिक बदलाव के बीच उन्हें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी।
सीमित संसाधनों के बीच घर से पढ़ाई करते हुए उन्होंने IIT की तैयारी की और पहले ही प्रयास में IIT रोपड़ में दाखिला हासिल कर लिया। इंजीनियरिंग की पढ़ाई ने उनके करियर के लिए नए रास्ते खोले और आगे चलकर उन्हें विदेश में नौकरी करने का मौका भी मिला।
विदेश की नौकरी में मन नहीं लगा, समाज के लिए कुछ करने की चाह बढ़ी
IIT के बाद देव ने विदेश में नौकरी की। करियर के लिहाज से यह एक अच्छा अवसर था, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें लगा कि वह सिर्फ कॉर्पोरेट नौकरी तक सीमित नहीं रहना चाहते।
उनका झुकाव जमीनी स्तर पर लोगों के बीच काम करने और सिविल सेवा के जरिए समाज से जुड़ने की ओर बढ़ा। इसी सोच के बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर UPSC की तैयारी करने का फैसला लिया। परिवार के लिए भी यह निर्णय आसान नहीं था, क्योंकि एक अच्छी नौकरी छोड़कर दोबारा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करना जोखिम भरा कदम था।
UPSC की तैयारी में बार-बार मिली असफलता (Success Story)
सिविल सेवा की तैयारी शुरू करने के बाद देव को शुरुआती दौर में लगातार झटके लगे। प्रीलिम्स में सफलता नहीं मिलने पर कई बार उन्हें लगा कि शायद यह रास्ता उनके लिए नहीं है।
असफलताओं का असर इतना हुआ कि उन्होंने नोट्स तक बेचने के बारे में सोचा। लेकिन उन्होंने तैयारी छोड़ने के बजाय अपनी गलतियों को समझने की कोशिश की। उन्हें एहसास हुआ कि सिर्फ घंटों पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि परीक्षा की मांग के हिसाब से रणनीति बनाना भी जरूरी है।
जब पढ़ाई का तरीका बदला तो बदलने लगी कहानी
लगातार असफलताओं के बाद देव ने अपनी रणनीति पर दोबारा काम किया। उन्होंने अपनी कमियों की पहचान की और प्रीलिम्स से लेकर मेन्स और इंटरव्यू तक के लिए अलग-अलग तरीके से तैयारी शुरू की।
इसी दौरान उनकी निजी जिंदगी में भी कई उतार-चढ़ाव आए। रिश्तों में आई परेशानियों और समाज के तानों के बीच भी उन्होंने खुद को तैयारी से जोड़े रखा। उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी गलतियों से सीखने और आगे बढ़ने पर ध्यान दिया।
आखिरी प्रयास में नौकरी के साथ UPSC दी और मिली 629वीं रैंक
देव का संघर्ष आखिरकार उस मुकाम पर पहुंचा, जिसका वह लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। अपने अंतिम प्रयास में उन्होंने नौकरी के साथ UPSC की परीक्षा दी और 629वीं रैंक हासिल की।
इस रैंक के साथ उनका चयन IRTS यानी इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस में हुआ। उनके लिए यह सिर्फ एक परीक्षा पास करने की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि वर्षों की असफलताओं, संघर्ष और परिवार की परिस्थितियों से निकलकर अपनी अलग पहचान बनाने का परिणाम था।
बागी परिवार की पहचान से अलग शिक्षा ने बनाई नई पहचान
देव की कहानी का सबसे खास पहलू उनके परिवार की पृष्ठभूमि और उनके चुने हुए रास्ते के बीच का अंतर है। एक तरफ उनके दादा की जिंदगी चंबल के संघर्षों से जुड़ी रही, तो दूसरी तरफ देव ने उसी परिवार में शिक्षा को आगे बढ़ने का माध्यम बनाया।
IIT से पढ़ाई, विदेश की नौकरी और फिर UPSC में सफलता तक का उनका सफर दिखाता है कि करियर की राह में असफलताएं आने के बाद भी रणनीति बदलकर दोबारा कोशिश की जा सकती है। देव ने आखिरकार अपनी मेहनत से वह मुकाम हासिल किया, जिसे पाने के लिए उन्होंने कई वर्षों तक संघर्ष किया था।

