UPSC Success Story: पिता लगाते हैं चाय-नाश्ते का ठेला, बेटे ने UPSC में रचा इतिहास, 6 बार हार के बाद मिली बड़ी कामयाबी

UPSC Success Story: मुजफ्फरपुर के घनश्याम जायसवाल ने सीमित संसाधनों के बीच UPSC की तैयारी की। कई परीक्षाओं में असफलता के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार असिस्टेंट कमांडेंट बनने में कामयाब रहे।

UPSC Success Story: किसी के पास महंगे संस्थान और बड़े संसाधन होते हैं, तो किसी को अपने सपनों के लिए सीमित साधनों में ही रास्ता बनाना पड़ता है। मुजफ्फरपुर के घनश्याम जायसवाल की कहानी इसी जज्बे की मिसाल है। उनके पिता बैरिया बस स्टैंड पर चाय और नाश्ते का ठेला लगाकर परिवार चलाते हैं। घर की परिस्थितियां साधारण थीं, लेकिन घनश्याम ने अपने लक्ष्य को कभी छोटा नहीं होने दिया। लगातार असफलताओं के बाद आखिरकार उन्होंने UPSC परीक्षा में सफलता हासिल की और असिस्टेंट कमांडेंट बनने का मुकाम पाया।

बड़े परिवार में पले-बढ़े, फिर भी पढ़ाई पर रखा फोकस

घनश्याम का परिवार मुजफ्फरपुर के बैरिया इलाके में रहता है। उनके पिता शत्रुधन शाह छोटी सी चाय-नाश्ते की दुकान चलाते हैं और उनकी मां गीता देवी गृहिणी हैं। सात भाई-बहनों वाले परिवार में घनश्याम तीसरे नंबर पर हैं। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच पढ़ाई के लिए समय और संसाधन जुटाना उनके लिए आसान नहीं रहा होगा, लेकिन उन्होंने अपनी शिक्षा को लगातार आगे बढ़ाया।

स्कूल से कॉलेज तक मुजफ्फरपुर में हुई पढ़ाई

घनश्याम ने दसवीं तक की पढ़ाई बैरिया स्थित नथुनी भगत विद्यालय से की। इसके बाद उन्होंने रामेश्वर सिंह कॉलेज से 12वीं की पढ़ाई पूरी की। आगे उन्होंने राजनीति विज्ञान को विषय बनाकर स्नातक की डिग्री हासिल की। इसी दौरान उनके मन में सिविल सेवा को करियर बनाने का विचार मजबूत हुआ और उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी।

इंजीनियर बनने का सपना था, रास्ता बदलकर चुनी सिविल सर्विस (UPSC Success Story)

घनश्याम बचपन में इंजीनियर बनना चाहते थे। उनका सपना IIT में पढ़ाई करने का था, लेकिन यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई। उन्होंने इसे अपनी जिंदगी की आखिरी असफलता नहीं माना। इसके बाद उन्होंने अपने लिए नया लक्ष्य चुना और सिविल सेवा की तैयारी में पूरी तरह जुट गए।

एक-दो नहीं, 10 से ज्यादा परीक्षाओं में मिली असफलता

घनश्याम की कहानी की खास बात उनकी मंजिल से ज्यादा उनका सफर है। उन्होंने अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाओं में कई बार कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। उनकी असफलताओं का आंकड़ा 10 से ज्यादा परीक्षाओं तक पहुंचा। UPSC में भी लगातार छह प्रयास उनके पक्ष में नहीं रहे। इतनी बार नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आने के बावजूद उन्होंने तैयारी रोकने का फैसला नहीं किया।

करीब पांच साल तक चलता रहा संघर्ष

घनश्याम ने लगभग पांच वर्षों तक अपने लक्ष्य के लिए लगातार मेहनत की। हर असफल प्रयास के बाद उन्होंने अपनी कमियों को समझने और तैयारी को बेहतर करने की कोशिश की। आखिरकार उनकी मेहनत सफल हुई और UPSC के जरिए असिस्टेंट कमांडेंट बनने का सपना पूरा हो गया।

खुद की पढ़ाई के साथ बच्चों को भी पढ़ाया

तैयारी के दौरान घनश्याम ने सिर्फ अपनी पढ़ाई पर निर्भर रहने के बजाय बच्चों को पढ़ाने का काम भी किया। कोविड के बाद उन्होंने 12वीं तक के विद्यार्थियों को कोचिंग दी। इससे उन्हें कुछ आर्थिक सहारा मिला। साथ ही पढ़ाने की वजह से उनके अपने विषयों का रिवीजन भी होता रहा।

घनश्याम की कहानी बताती है कि असफलता अंतिम पड़ाव नहीं

घनश्याम जायसवाल की कामयाबी की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें सफलता से पहले कई बार हार आई। आर्थिक सीमाएं, बड़ी पारिवारिक जिम्मेदारियां और प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार असफलता भी उनके इरादे को कमजोर नहीं कर सकी। उन्होंने अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए रास्ता बदलने के बजाय अपनी कोशिश जारी रखी।

आज उनकी सफलता उन विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा बन सकती है, जो सुविधाओं की कमी या शुरुआती असफलताओं की वजह से अपने सपनों को अधूरा छोड़ने का सोचते हैं। घनश्याम का सफर यही बताता है कि सफलता कई बार पहली कोशिश में नहीं मिलती, लेकिन कोशिश छोड़ देने से जरूर दूर हो जाती है।

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