Japanese Encephalitis: बारिश का मौसम अपने साथ हरियाली और ठंडक लेकर आता है, लेकिन इसी दौरान मच्छरों से फैलने वाली कई गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। आमतौर पर लोग डेंगू और मलेरिया से सावधान रहते हैं, लेकिन एक ऐसी वायरल बीमारी भी है जो सीधे दिमाग को प्रभावित कर सकती है। इस बीमारी का नाम जापानी इंसेफेलाइटिस (Japanese Encephalitis) है। समय पर इलाज न मिलने पर यह बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है और कई मामलों में मरीज को लंबे समय तक न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
क्या है जापानी इंसेफेलाइटिस?
जापानी इंसेफेलाइटिस एक गंभीर वायरल संक्रमण है, जो जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस (JEV) के कारण होता है। यह वायरस फ्लैविवायरस परिवार का हिस्सा है, जिसमें डेंगू और वेस्ट नाइल वायरस भी शामिल हैं। संक्रमण मुख्य रूप से संक्रमित क्यूलेक्स (Culex) मच्छरों के काटने से फैलता है। ये मच्छर धान के खेतों, दलदली इलाकों, तालाबों और बारिश के बाद जमा पानी के आसपास तेजी से पनपते हैं और शाम से सुबह तक अधिक सक्रिय रहते हैं।
कैसे पहुंचता है वायरस दिमाग तक?
विशेषज्ञों के अनुसार, मच्छर के काटने के बाद वायरस सबसे पहले रक्त में प्रवेश करता है। कुछ मामलों में यह शरीर की सुरक्षा प्रणाली को पार करते हुए दिमाग तक पहुंच जाता है। इसके बाद मस्तिष्क में सूजन शुरू हो जाती है, जिसे मेडिकल भाषा में इंसेफेलाइटिस कहा जाता है। यही स्थिति मरीज के लिए सबसे अधिक खतरनाक साबित होती है।
Japanese Encephalitis: किन लोगों में सबसे ज्यादा रहता है खतरा?
यह बीमारी किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है, लेकिन बच्चों में इसका जोखिम अधिक माना जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, धान के खेतों में काम करने वाले किसान और ऐसे लोग जिन्होंने इस बीमारी से बचाव का टीका नहीं लगवाया है, उनमें संक्रमण की आशंका अधिक रहती है। दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों की तरह भारत में भी हर साल इसके मामले सामने आते हैं।
शुरुआती लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें
शुरुआत में यह बीमारी सामान्य वायरल संक्रमण जैसी लग सकती है। मरीज को बुखार, सिरदर्द, उल्टी, थकान और कमजोरी महसूस हो सकती है। लेकिन यदि वायरस दिमाग तक पहुंच जाए तो तेज बुखार, बेहोशी, दौरे पड़ना, गर्दन में अकड़न, भ्रम की स्थिति, चलने-फिरने में परेशानी और होश खोने जैसे गंभीर लक्षण सामने आ सकते हैं। ऐसे संकेत दिखने पर तुरंत अस्पताल पहुंचना बेहद जरूरी है।
कैसे होती है बीमारी की जांच?
सिर्फ सामान्य जांच या सीटी स्कैन से हर बार इस बीमारी की पुष्टि नहीं हो पाती। डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार एमआरआई, रक्त जांच और जरूरत पड़ने पर सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड (CSF) की जांच करवाकर संक्रमण की पुष्टि करते हैं। समय पर जांच से इलाज शुरू करने में आसानी होती है।
क्या इसका कोई इलाज मौजूद है?
फिलहाल जापानी इंसेफेलाइटिस के लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर मरीज की स्थिति को स्थिर रखने, बुखार नियंत्रित करने, दौरे रोकने और अन्य जटिलताओं का इलाज करते हैं। इसलिए इस बीमारी में बचाव को ही सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है।
संक्रमण से बचने के आसान उपाय
- घर और आसपास पानी जमा न होने दें।
- शाम और रात के समय मच्छरों से बचाव के लिए पूरी बांह के कपड़े पहनें।
- मच्छरदानी और मच्छर भगाने वाले रिपेलेंट का नियमित उपयोग करें।
- संक्रमण प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य विभाग की सलाह के अनुसार टीकाकरण करवाएं।
- तेज बुखार या न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
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